Monday, 21 April 2014

भाषा विज्ञान की व्याख्या


ज्ञान दो प्रकार का होता है।१.सहज व नैसर्गिक २.बुद्धि ग्राह्य
१.नैसर्गिक ज्ञान पशुधारी में अधिक मात्रा में होता है।
२.बुद्धि ग्राह्य इसके अन्तर्गत भी विशिष्ट ज्ञान रहता है। भाषा के विशिष्ट ज्ञान को भाषा विज्ञान कहते है। १.तथ्यो का संकलन  २. वर्गीकरण ३. व्याख्या इसके आधार पर –विज्ञान –यह ज्ञान की विशिष्ट पद्धति होती है।
विशिष्ट ज्ञान- विज्ञान के नियम सार्वत्रिक तथा सार्वदेशिक होते है। जैसे-न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त। इस प्रकार विज्ञान में आधारभुत सिद्धान्त है –कारण कार्य की नित्यता ।
इसके विपरित जिसमे विकल्प के लिए अवकाश रहता है, ऐसे ज्ञान को कला जाता है। विज्ञान का उद्देश्य शुद्ध ज्ञान है,  जबकि कला का उद्देश्य मनोरंजन या उपयोगिता है।
ज्ञान को इस समय तीन भागों में विभाजित किया जाता है।१. प्राकृतिक विज्ञान- इसमें प्रकृति के तत्वों का विवेचन होता है।जैसे-गणित, रसायन,्भौतिक आदि।
२.सामाजिक विज्ञान-इसमें मनुष्यों के सामाजिक या समाज सापेक्ष विषयों का अध्ययन होता है।जैसे- समाजशास्त्र ,अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र ।
३.मानवविज्ञान-इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत सृजनात्मक ज्ञान का उल्लेख होता है।संगीत, साहित्य
                   भाषा विज्ञान वैज्ञानिक पद्धति के कारण प्राकृतिक विज्ञान के अन्तर्गत भी आ सकता है। जैसे- ध्वनि की प्रकृति उसका उत्पादन , ध्वनि को उत्पन्न करने वाले वाक् यंत्र की रचना , उसके ध्वनि लहर के रुप में विस्तार आदि विषय प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में आते है।भाषा समाज की ही उपज है,और समाज में ही परस्पर व्यवहार का साधन है।अतः यह सामाजिक तो है ही ,भाषा का सृजनात्मक पक्ष मानविकी के अन्तर्गत रखा जा सकता है।भाषा विज्ञान के नियम गणित की भांति सर्वथा देशकाल निरपेक्ष नियत नही है।और नही यह दर्शन की भांति केवल अनुभव पर आधारित है।कह सकते है कि भाषा विज्ञान में गणित तथा अनुभव दोनों का ही योग है।इस दिशा में अब भाषा की रचना उसके विभिन्न स्तर , ध्वनि , ध्वनिग्राम, रुप, वाक्य रचनादि के प्रयोग तथा वितरण या (आकृति) वैज्ञानिक पद्धति से पूर्ण विवेचन किया जाता है।यह अध्ययन गणितीय सूत्रों के आधार पर ही किया जाता है।इसमें विभिन्न प्रकार के यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।इस प्रकार भाषा के सांगोपांग , व्यवस्थित ,विशिष्ट वैज्ञानिक अध्ययन के क्षैत्र में जो उपलब्धियाँ आधुनिक भाषा विज्ञान वेत्ताओं ने अर्जित की है, उसे देखते हुए भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता में संदेह नही है।
भाषा विज्ञान- जिस विज्ञान के अन्तर्गत समकालिक ,एतिहासिक, तुलनात्मक और प्रायोगिक अध्ययन के सहारे भाषा ही नही अपितु सामान्य की उत्पति गहन प्रकृति एवं विकास आदि की सम्यक व्याख्या करते हुए इन सभी के विषय में सिद्धान्तों का निर्धारण हो, उसे भाषाविज्ञान कहते है।
                   इस अध्ययन में विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग हो सकता है\जिसमें कालखण्ड विशेष के भाषा रुप को लेकर अध्ययन किया जाता है, उसे समकालिक, सांगकालिक अध्ययन कहते है।इसके अंदर दो पद्धतियाँ अपनाई जाती है।
१,वर्णनात्मक-इसमें उस भाषा के गठन का विश्लेषण किया जाता है।
२.संरचनात्मक-इसमें भाषा के गठन के विश्लेषण के साथ-्साथ उसके विभिन्न अवयवों अंतःसंबन्धों का संरचनात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है।
ऐतिहासिक – इसमें भाषा के विकास के भिन्न-भिन्न रुपों का या अवस्था का अध्ययन किया जाता है।जैसे-वैदिक से भौतिक संस्कृत , पाली,प्राकृत,अपभ्रंश तथा वर्तमान भाषाएँ। इस पूरे क्रमिक नियमों का अध्ययनेतिहासिक दृष्टि से किया जाता है।इसको हम मात्रात्मक कह सकते है, कालक्रमिक कह सकते है।
तुलनात्मक पद्धति-इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक भाषाओं या उनकी गठन के भेद व साम्य की दृष्टि से अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन एक ही भाषा के विभिन्न काल के रुपों का भी हो सकता है। इससे प्रतीत होता है कि एतिहासिक अध्ययन प्रायः तुलनात्मक होता ही है। वास्तव में आधुनिक भाषा का अध्ययन तुलनात्मक अध्ययन का ही परिणाम है। संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, आदि के तुलनात्मक अध्ययन के फलस्वरुप ही भाषा विज्ञान का जन्म हुवा। इसका प्राचीन नाम है-तुलनात्मक व्याकरण या भाषा विज्ञान । तुलनात्मक अध्ययन समकालिक तथा एतिहासिक दोनों ही हो सकता है।
प्रायोगिक भाषा विज्ञान- इसके अन्तर्गत भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के फलस्वरुप प्राप्त सिद्धान्तों का भाषा के व्यवहारिक उपयोग के क्षैत्र में उपयोग किया जाता है।
जैसे- भाषा की लिखने, सिखाने की विधि , अनुवाद, कार्य, अनुवाद संबंधी मशीन, टाइप तथा मुद्रणें कम्प्युटर में सुधार,्हकलाना, तुतलाना आदि उच्चारण दोषों को दुर करना।
                   भाषा एक संघटना और संघटना के भिन्न भिन्न स्तर होते है। उन विभिन्न स्तर की इकाईयाँ भी भिन्न होती है। वैज्ञानिक अध्ययन में इन इकाईयों की क्रियाशीलता उनका परस्पर संबंध तथा विभिन्न स्तरों में अंतःसंबंध आदि का विश्लेषण किया जाता है। वास्तव में भाषा एक अखण्ड वाक् प्रवाह है। पारमार्थिक दृष्टि से उसमें भेद नही है। परन्तु व्यवहारिक दृष्टि से विश्लेषण की सुविधा से विभिन्न स्तर भेदों की कल्पना की जाती है। इस तथ्य की पुष्टि भतृहरि ने अपने

‘पदेक वर्णा न विद्यन्ते वाक्यात् पदानां सामयिक विभागः’ वाक्य में की है।

Saturday, 5 April 2014

भाषा के अंग


वर्ण-नाद की लघुतम , अविभाज्य ,व्यवहारार्थ (व्यवहार योग्य) इकाई वर्ण है।
संकेत- सरलता सुक्ष्मता ,स्पष्टता जिनका स्वर की सहायता से ही उच्चारण हो,वह व्यंजन
          स्वयं राजन्ते इति स्वराः ।
संकेत का अर्थ अपेक्षाकृत व्यापक है, प्रायः संकेत तथा संकेतिक में निश्चित संबंध होता है।
जैसे- बच्चे का चित्रवाला वह मोटर चालक को पाठशाला के होने की सुचना देता है । उसे समझने के लिए भाषा विशेष का बोध होना आवश्यक नही है।
प्रतीक- समुदाय विशेष में उसकी इच्छा के अनुभव प्रयुक्त होते है।वे किसी पुर्ण अर्थ को अंश के माध्यम से व्यक्त करते । इनमें प्रतीक तथा प्रतित्य में निश्चित संबंध नही हुवा। जैसे- ‘गाय’ इस शब्द का उच्चारण करने पर केवल उस भाषा समुदाय के लिए ही विशिष्ट प्राणी का अर्थ बोध होता है।
व्यवस्था-ऐसी सुनिश्चित योजनानुसार घटक ईकाइयों और अवयवों के क्रम, संख्या ,प्रकार आदि का निर्धारण हो, उसे व्यवस्था कहते है।
प्रत्येक भाषा में अनन्त ध्वनियों मे से जो कुछ निश्चित ध्वनियों का ही प्रयोग होता है, उन ध्वनियों का क्रम भी निश्चित होता है, उन ध्वनियों के संयोगादि का भी प्रकार निश्चित होता है। इसके अतिरिक्त पद, पदसमुच्चय , तथा वाक्य रचनादि में भी क्रमबद्धता होती है। यह व्यवस्था समाज के द्वारा निश्चित होती है। व्यवस्था के अन्तर्गत उपव्यवस्थाएँ भे होती है। उस समाज के सभी सदस्य उस निश्चित व्यवस्था से परिचित होते है। तथा उसी के अनुरुप भाषा का व्यवहार करते है। इस प्रकार निश्चित समाज स्वीकार मर्यादा के अन्तर्गत क्रम बद्धता का पुर्व ज्ञान ही भाषा की व्यवस्था का परिचायक है। पूर्व ज्ञान होने के कारण ही भाषा का प्रायोग संभव होता है। तथा इसी के कारण भाषा में सम्प्रेषण अर्थात अर्थ का आदान-्प्रदान सम्भव होता है।

किसी भाषा के शब्द समुह का ही ज्ञान उस भाषा के व्यवहार या प्रयोग के लिए पर्याप्त नही होता ,अर्थात वस्तु या प्राणी आदि के बोधक पदों या शब्दों को जान लेने पर ही उनके विषय में वाण्छित बात नही की जा सकती, जब तक की हमें उस भाषा की व्यवस्था का बोध न हो। इस व्यवस्था को ही संरचना या संघटना कहते है।यह व्यवस्था न केवल वाचिक प्रतीकों की व्यवस्था तक सीमित है, अपितु अपनी सामाजिक अव्यवस्था के अनुरुप अर्थ के स्तर पर भी निश्चित क्रम तथा व्यवस्था होती है। इस तरह हमें अर्थ को भी अपने अभीष्ट कथन के रुप में स्थरीकृत तथा व्यवस्थित करना होता है। इस व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान ही हमें उस भाषा के व्यवहार के लिए समर्थ बनाता है। 

Tuesday, 18 March 2014

भाषा का रुप परिवर्तन



भाषा चिरपरिवर्तनशील है। भाषा में परिवर्तन या विकास उसके पाँचों ही रुपों –ध्वनि ,शब्द, रुप, अर्थ और वाक्य में होता है। भाषा में परिवर्तन दो प्रमुख भागों में विभाजित है।
१.आभ्यन्तर  २. बाह्य                                                    
                   आभ्यन्तर वर्ग में भाषा की अपनी स्वाभाविक गति तथा वे कारण सम्मिलित है जो प्रयोज्या की शारीरिक तथा मानसिक योग्यता आदि सम्बन्धित स्थिति से सम्बन्ध रखते है । बाह्य वर्ग में वे कारण आते है , जो बाहर से भाषा को प्रभावित करते है।
१.आभ्यन्तर वर्ग- (क) प्रयोग से घिस जाना- अधिक प्रयोग के कारण धीरे-धीरे सभी चीजों की भाँति भाषा में भी स्वाभाविक रुप से परिवर्तन होता है। संस्कृत की कारकीय विभक्तियाँ इसी प्रकार धीरे धीरे घिसते घिसते समाप्त हो गई।
(ख) बल- जिस ध्वनि या अर्थ पर अधिक बल दिया जाता है, वह अन्य ध्वनियों या अर्थो को या तो कमजोर बना देते है या समाप्त कर देते है। इस प्रकार इनके कारण भी भाषा में परिवर्तन हो जाता है।
(ग) प्रयत्न लाघव- व्यक्ति कम से कम प्रयास से अधिक से अधिक काम करना चाहता है, इसी प्रयत्न लाघव के प्रयास से ही शब्दों को सरल बनाने या सरलता के लिए कभी तो बड़ा और कभी छोटा बना डालते है। कृष्ण का कन्हैया , कान्हा का किशन , गोपेन्द्र का गोबिन , स्टेशन का टेशन, प्लेटो से अफलातुन । प्रयत्नलाघव कई प्रकार से लाया जाता है,  स्वर लोप- अनाज से नाज, एकादश से ग्यारह, २.व्यंजन लोप- स्थाली से थाली, ३. अक्षर लोप- शहतुत से तुत ४. स्वरागम- स्काउट से इस्काउट, कर्म से करम , कृपा से किरिपा ५. व्यंजनागम- अस्थि से हड्डी ६. विपर्यय- वाराणसी से बनारस ७समीकरण- शर्करा से शक्कर, ७. विषमीकरण- काक से काग, ८. स्वतः अनुनासिक – श्वास से साँस, तथा कुछ अन्य जैसे- गृह से घर, वधु से बहु आदि।
(घ)मानसिक स्तर-्बोलने वालों के मानसिक स्तर में परिवर्तन होने से विचारों में परिवर्तन होता है। विचारों में परिवर्तन होने से अभिव्यंजना के रुप में परिवर्तन होता है। और इस प्रकार भाषा पर भी प्रभाव पड़ता है।
(ण)अनुकरण की अपूर्णता-अनुकरण प्रायः अपूर्ण होता है, होता यह है कि अनुकरण में अनुकर्ता कुछ भाषिक तथ्यों को छोड़ देता है, तथा कुछ को अपनी ओर से अनजाने ही जोड़ देता है। इस तरह अनुकरण में भाषा का परिवर्तन पनपता है।
अनुकरण की अपुर्णता के लिए भी कई कारण है-(१)शारीरिक विभिन्नता-ध्वनियों का उच्चारण अंगों के सहारे करते है। और सब उच्चारण अंग एक से नही होते, अतएव उनका अनुकरण पूर्ण नही हो पाता।

Friday, 7 March 2014

स्वर-प्रक्रिया


         
                             उदात्त और अनुदात्त शुद्ध और स्वतंत्र स्वर है। इन्हीं दोनों के मेल से स्वरित की उत्पत्ति होती है। इन सबके चिन्हों के आधार पर लक्षण निम्नलिखित प्रकार के है-
उदात्तः- अपूर्वो अनुदात्तपूर्वो वा अतद्धितः उदात्तः।
जिससे पूर्व कोई स्वर न हो, अथवा अनुदात्त पूर्व में हो, (स्वरित उत्तर में हो) एसा चिन्ह रहित अक्षर उदात्त होता है। --
अनुदात्त- अणोरेखयाअनुदात्तः ।   अक्षर के नीचे पड़ी रेखा से अनुदात्त स्वर का निर्देश किया जाता है।
स्वरित- उर्ध्व रेखया स्वरितः । अक्षर के ऊपर खड़ी रेखा से स्वरित का निर्देश किया जाता है।
उदात्तानुदात्तस्य  स्वरितः ।  प्रचय- स्वरितात् परो अतद्धित  एकयुति।
स्वरित से परे जिस या जिन अक्षरो पर कोई चिन्ह न हो , उन्हें एकयुति अथवा प्रचय कहते है।
स्वर शास्त्र में अक्षर शुद्ध स्वर वर्ण अथवा व्यंजन सहित स्वर का वाचन होता है। यद्यपि स्वर शास्त्र के अनुसार उदात्त आदि स्वर धर्म स्वर वर्णो के ही है। तथापि स्वर निर्देश प्रकरण में चिन्हों के ठीक ज्ञान के लिए व्यंजन विशिष्ट स्वरों का उल्लेख किया जाता है। उनके निर्देश से अभिप्राय तत्तत् अर्थो से ही है, व्यंजनों से नही । अष्टाध्यायी के अतिरिक्त अन्य प्राचीन स्वर शास्त्रों में स्वरित के अनेक भेद निहित है, वैदिक ग्रंथों में उनमे से कतिपय विशिष्ट स्वरितों में अंकन के लिए विभिन्न चिन्हों की व्यवस्था उपलब्ध होती है। यदि उदात्त के पश्चात के अनुदात्त के पश्चात पुनः उदात्त आवे तो वह अनुदात्त ही रहता है। प्रातिशाख्य आदि ग्रन्थों में नव प्रकार के स्वरितों का उल्लेख मिलता है। इनमें से मुख्यतया पाँच महत्वपूर्ण है।
१-संहितज अथवा सामान्य स्वरित- एक पद में अथवा अनेक पदों की संहिता में उदात्त से परे अनुदात्त को जो स्वरित होता है, उसे सामान्य स्वरित कहते है,
२. – जात्या- जो स्वरित अपनी जाति (जात्य, स्वभाव) से स्वरित होता है, अर्थात जो किसी उदात्त वर्ण के संयोग से अनुदात्त स्वरित भाव को प्राप्त नही होता , उसे जात्य स्वरित कहते है। तैत्तरीय प्रातिशाख्य में इसे नित्य स्वरित कहा है,  यह स्वरित पदपाठ में भी स्वरित ही बना रहता है । अभिनिहित, क्षैप्र , तथा प्रश्लिष्ट संधियों के फलस्वरुप उत्पन्न होने वाले स्वरित तत् तत् संधियों के नाम पर अभिनिहित, क्षैप्र तथा प्रश्लिष्ट स्वरित कहलाते है।
३. अभिनिहित- एकार तथा ओकार से परे जहाँ ह्रस्व अकार का बोध अथवा पूर्वरुप होता है, उस संधि को प्रातिशाख्यों में अभिनिहित संधि कहते है। इस संधि के कारण उदात्त एकार अथवा उदात्त ओकार ( चाहे वह स्वतंत्र रुप से हो अथवा संधि से बना हो) से परे अनुदात्त अकार का बोध अथवा पूर्व रुप ह्प्ने पर जो स्वरित होता है, उसे अभिनिहित संधि के कारण अभिनिहित स्वरित कहते है।
४. क्षैप्र- इ उ ऋ लृ के स्थान में अच् परे रहने पर जो य् र् व् ल् (यण्) आदेश रुप संधि होती है, उसे प्रातिशाख्यों में क्षैप्र संधि कहते है। इसी क्षैप्र संधि के अनुसार यहाँ उदात्त इकार उकार के स्थान में यण् आदेश होने पर उनमें अनुदात्त स्वर को स्वरित हो जाता है, उसे क्षैप्र स्वरित कहते
५.प्रश्लिष्ट- दो अर्थो के मिलने से जो संधि होती है, उसे प्रश्लिष्ट संधि कहते है। और इअस कारण होने वाला स्वरित प्रश्लिष्ट स्वरित कहलाता है।  वैसे प्रातिशाख्यों के अनुसार प्रश्लिष्ट संधि पाँच प्रकार की होती है, परन्तु स्वरित मेम केवल दो प्रकारों की (उदात्तह्रस्व+ अनुदात्तह्रस्व)्दीर्घ रुप संधि में देखा जाता है।
विशेषवक्तव्य- उदात्त और अनुदात्त स्वरों की प्रश्लिष्ट संधि दो प्रकार की होती है। एक वह जिसमें पूर्ववर्ण अनुदात्त हो, और उत्तरवर्ण उदात्त । एसी सभी प्रश्लिष्ट संधियों में दोनों स्वरों के स्थान में उदात्तरुप एकादेश होता है। दुसरी प्रश्लिष्ट संधि वह है जिसमें पूर्ववर्ण उदात्त हो और उत्तर वर्ण अनुदात्त । इन दोनों स्वरों के स्थान पर जो एकादेश होता है , वह शाखा भेद से भी उदात्त और कहीं स्वरित देखा जाता है , ऋग्वेद की शाकल शाखा में यह स्वरित ही होता है और इसे प्रश्लिष्ट स्वरित कहते है।

Thursday, 27 February 2014

स्वर-प्रक्रिया



अन्धकारे दीपिकाभिर्गच्छन् स्खलन्ति क्वचित्
एवं स्वरै प्रतीचानां भक्त्यर्थम् स्फुटन्ति।
                   जिस प्रकार अन्धकार में दीपिका की सहायता से चलता हुवा व्यक्ति कही ठोकर खाता, उसी प्रकार स्वरों की सहायता से किए गए अर्थ स्फुट (सन्देह रहित) होते है।
उदात्तादि स्वरों की सत्ता वैदिक भाषा की विशेषता है। वेद के वास्तविक अभिप्राय तक पहुँचने के जितने साधन है, उनमें स्वर-शास्त्र सबसे प्रधान है। व्याकरण और निरुक्त जैसे प्रमुख शास्त्र भी स्वर-शास्त्र के अंग बनकर ही वेदार्थ ज्ञान में सहायक होते है। स्वर शास्त्र का विरोध होने पर ये दोनों शास्त्र पंगु बने रहते है। स्वर ज्ञान के बिना न केवल मंत्र का वास्तविक अभिप्राय ही अज्ञात रहता है, अपितु स्वर शास्त्र की उपेक्षा से अनेक स्थानों में अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है। इसलिए वेद के सूक्ष्मांतक अभिप्राय तक पहुँचने के लिए उदात्त आदि स्वरों का ज्ञान नितांत आवश्यक है।
                   स्वर शब्द लौकिक और वैदिक वाड़्मय में भिन्न अर्थो में प्रयुक्त होता है। वाक् वर्ण विशेष अत्+ऋणादि संगीत शास्त्र के स्वर यण , प्राण, सूर्य , प्रणव, उदात्तादि ध्वनि विशेष प्रस्तुत संदर्भ में स्वर शब्द से वैदिक वाड़्मय में प्रसिद्ध उदात्त, अनुदात्त , स्वरित संज्ञक उच्चारण विषयक वर्ण वर्गो का ग्रहण होता है।
                   वैदिक वाड़्मय में उदात्त आदि स्वरों के अनेक भेद उल्लिखित है, कहीं सात, कहीं पाँच , कहीं चार, कहीं तीन ,कहीं दो और कहीं एक ही स्वर का उल्लेख मिलता है। महाभाष्य में सात स्वर गिनाये गए है। नाटक शिक्षा में ५स्वर ।
                   उदात्ताश्चानुदात्तश्चस्वरितप्रचितोतथा
                   निपातश्चेति विधेय स्वरभेदस्तु पंचमः।
साधारणतया निपात शब्द अनुदात्त अर्थ में प्रसिद्ध है,  शाकव, माध्यन्दित , कण्व, कौथुम, आदि संहिताओं में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित इन तीन स्वरों का ही उच्चारण होता है। प्रचय स्वर का भी उल्लेख है।
                             स्वर शास्त्र के अनुसार उदात्त आदि समस्त स्वर उच्चारण वर्ण स्वर अर्थात् अच् संज्ञक वर्णो के धर्म है, व्यंजनों के नही। अच् ही ऐसे वर्ण हैजिनका उच्चारण बिना अन्य वर्ण की सहायता के होता है, स्वयं सजन्त इति स्वराः। महाभाष्य  ।१।२।३०
                             उदात्त अनुदात्त और स्वरित स्वरों के लक्षण और उनके उच्चारण की विधि का उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है। पाणिनीय मत-
                                      उच्चैः उदात्तः , नीचैः अनुदात्तः, समाहारः स्वरितः ।
जिस स्वर के उच्चारण में आयाम हो, उसे उदात्त कहते है,  आयाम का अर्थ है, मात्रों का स्वर की तरफ खींचा जाना ।जिस स्वर के उच्चारण में विलंब हो, उसे अनुदात्त कहते है। मात्रों की शिथिलता या उनका अधोगमन विश्राम कहलाता है । जिस स्वर के उच्चारण में आक्षेप हो, उसे स्वरित कहते है, आक्षेप का अर्थ है- मात्रों का निचैरगमन।  इस प्रकार के निर्देशन के आधार पर ही शुद्ध उच्चारण कर पाना कठिन ही है। इन स्वरों का सुक्ष्म उच्चारण प्रकार चिरकाल से लुप्तप्राय है, महाराष्ट्र में कुछ बृहद् ऋग्वेदीय ब्राह्मण स्वरों के सूक्ष्म उच्चारण में कदाचित् समर्थ होते, परन्तु अधिकतर श्रोत्रिय हस्त आदि अंगचालन के द्वारा ही उदात्त आदि स्वरों का द्योतन करते है।

Wednesday, 12 February 2014

समास-विचार


         
समास शब्द का अर्थ है ‘संक्षेप’ में कहना। अर्थात् दो या दो से अधिक शब्दों को इस प्रकार साथ रख देना कि उनके आकार में कुछ कमी हो जाय, और अर्थ भी पुरा पुरा मालुम हो। जैसे-
सभायाः पति =सभापति
समस्त पद -  यहाँ सभापति का वही अर्थ है जो ‘सभायाः पति’ का ।किन्तु दोनों को साथ रख देने से ‘सभायाः’ शब्द के विभक्ति सूचक प्रत्यय याः का लोप हो गया, और इस कारण ‘सभापति’ शब्द सभायाः पति से छोटा हो गया। इस प्रकार छोटा बनाकर रक्खे हुए शब्द को ‘समस्त पद’ कहते है।
विग्रह – किसी समस्त पद को तोड़कर उसका पहले का रुप दे देना ‘विग्रह’ कहलाता है। विग्रह का अर्थ है- टुकड़े-टुकड़े करना । समस्त शब्द के टुकड़े करके ही पहले का रुप दिखाया जा सकता है। इसलिए यह विग्रह है।जैसे- धनवाली का विग्रह ‘धनस्य वाली’ हुआ ।
                   किन शब्दों को कैसे और किन के साथ जोड़ सकते है, इसके सूक्ष्म से भी सूक्ष्म नियम संस्कृत के व्याकरणकारों ने निश्चित किए है। एसा नही है कि जिस शब्द को जब चाहा तब दुसरे के साथ जोड़ दिया । जैसे- ‘रघुवंश का लेखक कालिदास प्रसिद्ध कवि था’ – इस वाक्य का अनुवाद हुवा- ‘रघुवशंस्य लेखकः कालिदासः प्रसिद्धः कविः आसीत’ – इस संस्कृत वाक्य में यदि समास करे तो इस प्रकार होगा ‘रघुवंशलेखककालिदासः प्रसिद्धकविः आसीत्’  । कविः आसीत् में समास नही हुवा , ‘कालिदासः’ और ‘प्रसिद्धः’ में समास नही हुवा।
समास के ६ भेद है- १.तत्पुरुष २ कर्मधारय ३. द्वन्द ४. बहुब्रीहि ५. अव्ययीभाव ६ द्विगु
इन भेदों के नाम पर प्रस्तुत श्लोक है-
                   द्वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद् गेहे नित्मव्ययीभावः ।
                   तत्पुरुष कर्मधारय येनाहं स्यान्बहुब्रीहिः ॥
यह किसी याचक की किसी दाता से प्रार्थना है- मैं द्वन्द हूँ अर्थात् मैं दो हूँ (मैं और मेरी स्त्री) मैं द्विगु भी हूँ अर्थात् मेरी दो गाएँ (बैल) भी है।मेरे घर में नित्य अव्ययीभाव रहता है, अर्थात् मेरे घर में कभी कुछ खर्च नही होता । क्योंकि खर्च करने को द्रव्य ही नही। इसलिए है पुरुष  वह काम करो जिससे मैं बहुब्रीहि हो जाऊँ । अर्थात् मेरे घर में बहुत सा धान्य हो जाए। ब्रीहि का अर्थ धान्य है।